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"मेरा शर्मिला व्यकित्व या फिर कुछ और"

Posted On: 30 Jul, 2017 में

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कहते हैं न जो चीजे जब तक हमारी ज़िन्दगी में नहीं गुजरती तब तक हम उस चीज की निंदा करते हैं लेकिन जब गुजरती हैं तो सोचने और समझने का नजरिया बदल जाती हैंl ऐसा ही कुछ किसी से मोहाब्बत होने पर होता हैंl मेरे ज़िन्दगी में भी ये बदलाउ बड़ी तसब्बुर से हुईl मुझे वो वाकया अच्छे याद हैं क्योंकि उसकी पहली झलक मेरे दिमाग के पने में छप सी गयी थीl उसकी आँखे झील सी चमक रही थी उसे देखकर जैसे मानो मेरी दिल रूपी कमरे में अर्सो का छाया अंधेरा कही खो सा गया थाl मेरी आँखो को जैसे मानो इन्हें अँधेरा की चाहत ही नहीं रहीl हाँ ये वही थी जिसके पहली बार नाम सुऩते मुझे उन चंद शब्दों में मेरी पूरी दुनिया दिखेयेने गयी थीl है हम दोनों नदी के वो दो किनारे थे जो हमेशा साथ चलते रहे लेकिन कभी मिले नहीं पर एक किनारा अब कही खो गयाl क्योंकि मैं उसे कुछ न बता सका मेरी सारी खाइएश मेरी लब्जो तक नहीं आ सकीl और वो फिर दुनिया इस भीड़ में खो गयीl शायद उसे कुछ न कहने का कारण मेरा शर्मिला व्यकित्व तो नहीं या फिर कुछ और शायद मैं हमेशा गफलत में ही जिया होl उस बात को मानो अर्सा भीत गयाl उसके लिए वो इश्क़ लगी महोब्बत आज भी नहीं बदलीl मेरे इश्क़ के गवाह हैं वो सवारे वासी जिसने मुझे तनहा देखा हैं उसके इंतज़ार में.बस उसे बताना चाहता हूँ मेरा दिल उसकी यादो में किस हद तक मसरूफ रहा  करता हैlकाश ये पढ़ ले वो और मेरे प्यार के ज्स्तुझक को समझ जायेl
धन्यवाद                                                                                                                                               रितेश कुमार ,भिखना पहाड़ी ,पटना



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